डिजिटल सेवाओं के तेजी से बढ़ते उपयोग और तकनीकी ढांचे के विस्तार के चलते भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुख डेटा सेंटर हब के रूप में उभरने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। देश में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या में लगातार वृद्धि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग के कारण डेटा स्टोरेज और प्रोसेसिंग की जरूरत भी तेजी से बढ़ी है।

रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान समय में दुनिया के कुल डेटा उपयोग का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा एशिया-प्रशांत क्षेत्र से आता है, लेकिन इस क्षेत्र में मात्र 5 प्रतिशत डेटा सेंटर ही मौजूद हैं। यही अंतर भारत जैसे विकासशील देशों के लिए बड़े अवसर के रूप में देखा जा रहा है। भारत सरकार की डिजिटल इंडिया जैसी पहल और डेटा लोकलाइजेशन से जुड़ी नीतियों के चलते देश में डेटा सेंटर उद्योग को बढ़ावा मिल रहा है।

अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत में डेटा सेंटर से जुड़े बुनियादी ढांचे में लगभग 800 अरब डॉलर तक का निवेश किया जा सकता है। इससे न केवल डिजिटल सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार होगा, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। डेटा सेंटर की क्षमता में करीब 40 प्रतिशत तक की वृद्धि होने की संभावना है, जो भारत को वैश्विक डिजिटल बाजार में एक महत्वपूर्ण स्थान दिला सकती है।

भारत के पास विशाल जनसंख्या, तेजी से बढ़ता इंटरनेट उपयोग, डिजिटल भुगतान प्रणाली और आईटी सेवाओं का मजबूत नेटवर्क मौजूद है। इसके अलावा, क्लाउड स्टोरेज, ई-कॉमर्स, फिनटेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में बढ़ती मांग डेटा सेंटर उद्योग के विकास को और गति दे रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार की नीतियां और निजी क्षेत्र का निवेश इसी तरह जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में भारत एशिया-प्रशांत क्षेत्र का डिजिटल केंद्र बन सकता है। इससे रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी।
