आज (2 मार्च) रात होलिका दहन किया जाएगा। इस वर्ष फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 और 3 मार्च—दो दिन पड़ रही है। 3 मार्च को चंद्रग्रहण भी है, जिसके कारण होली और धुलंडी की तारीख को लेकर पंचांगों में मतभेद दिख रहे हैं।

होलिका दहन को धार्मिक दृष्टि से बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। वहीं आयुर्वेद और परंपराओं के अनुसार, यह मौसम परिवर्तन (सर्दी से गर्मी) के संधिकाल में स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना गया है।

🔥 होलिका में कौन-कौन सी चीजें डाली जाती हैं?
होलिका दहन को यज्ञ के समान माना गया है। जैसे यज्ञ में हवन सामग्री और औषधियां डाली जाती हैं, वैसे ही होलिका में भी पवित्र वस्तुएं अर्पित की जाती हैं, जैसे—
गाय के गोबर से बने कंडे
लकड़ियां (विशेषकर नीम की)
शहद और घी
काली मिर्च
हल्दी
काले तिल
चंदन
कमलगट्टा
नारियल और फल
मान्यता है कि इन औषधीय तत्वों से निकलने वाला धुआं वातावरण को शुद्ध करता है और संक्रमण फैलने की संभावना कम करता है।
🔁 होलिका की परिक्रमा क्यों की जाती है?
पौराणिक कथा के अनुसार, असुरराज हिरण्यकश्यपु की बहन होलिका, भक्त प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठी थी। भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहे और होलिका जल गई।
इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है। मान्यता है कि जिस होलिका की स्थापना की जाती है, उसमें भक्त प्रह्लाद की प्रतीकात्मक उपस्थिति होती है।
होलिका की परिक्रमा करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है और जीवन में नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है।
⚠️ ध्यान रखें: परिक्रमा करते समय जलती अग्नि से सुरक्षित दूरी बनाए रखें।
🌾 होलिका में अन्न क्यों डाला जाता है?
फाल्गुन मास नई फसल के आगमन का समय होता है। गेहूं और चना जैसी फसलें पककर तैयार होती हैं। किसान नई फसल का कुछ भाग होलिका में अर्पित कर भगवान को भोग लगाते हैं।
यह कृतज्ञता का प्रतीक है—प्रकृति और ईश्वर के प्रति धन्यवाद।
साथ ही नई फसल को भूनकर खाने की परंपरा भी कई जगहों पर प्रचलित है।
🌿 स्वास्थ्य से जुड़ा महत्व
ऋतु परिवर्तन के समय वातावरण में बैक्टीरिया और संक्रमण बढ़ने का खतरा रहता है। परंपरागत मान्यता है कि होलिका में डाली जाने वाली औषधियां और उससे निकलने वाला धुआं वातावरण को शुद्ध करने में सहायक होता है।