झारखंड में ट्रेजरी घोटाले के सामने आने के बाद अब ऑडिट (अंकेक्षण) विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग में पिछले 26 वर्षों से कोई नई नियुक्ति नहीं हुई है, जबकि स्वीकृत 242 पदों के मुकाबले महज 18 कर्मचारी ही काम संभाल रहे हैं।

मिली जानकारी के अनुसार, राज्य के ऑडिट विभाग की स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है। रांची स्थित मुख्यालय समेत कई जिलों में स्टाफ की भारी कमी है। विभाग में न तो पर्याप्त ऑडिटर हैं और न ही सीनियर पदों पर नियुक्तियां हो पाई हैं, जिससे वित्तीय अनियमितताओं पर समय रहते नजर रखना मुश्किल हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऑडिट विभाग किसी भी सरकार की वित्तीय पारदर्शिता का सबसे अहम हिस्सा होता है। ऐसे में कर्मचारियों की भारी कमी सीधे तौर पर निगरानी व्यवस्था को प्रभावित कर रही है। यही कारण है कि कई मामलों में वित्तीय गड़बड़ियों का समय पर खुलासा नहीं हो पा रहा।

इसी बीच गोड्डा-साहिबगंज ट्रेजरी में भी अनियमितताओं का मामला सामने आया है। बताया जा रहा है कि वहां बिना पर्याप्त जांच के भुगतान किए गए, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा। इस मामले में उपायुक्त (डीसी) से रिपोर्ट तलब की गई है और अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि सभी विभागीय प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जाए।
सूत्रों के अनुसार, विभाग में वर्षों से लंबित नियुक्तियों के कारण कार्य का बोझ बढ़ता जा रहा है। सीमित स्टाफ के कारण ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने और समय पर जांच पूरी करने में भी देरी हो रही है।
राज्य सरकार के लिए यह एक गंभीर चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर जल्द ही खाली पदों पर नियुक्ति नहीं की गई, तो वित्तीय अनुशासन और पारदर्शिता दोनों पर खतरा और बढ़ सकता है।